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Poetry

वह तोड़ती पत्थर

वह तोड़ती पत्थर; देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर— वह तोड़ती पत्थर। कोई न छायादार पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार; श्याम तन, भर बँधा यौवन, नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन, गुरु हथौड़ा हाथ, करती बार-बार प्रहार:— सामने तरु-माल...

Suryakant Tripathi NiralaSuryakant Tripathi Nirala 1 day ago · 1 min read 4 0 0